Gurmeet Gothwal

  1. कुछ आरम्भ करने के लिए आप का महान होना कोई आवश्यक नही.. लेकिन महान होने के लिए आप का कुछ आरम्भ करना अत्यंत आवश्यक है।

gurmeetgothwal89@gmail.com

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Dr bhuim rab Ambedkar ji

इसको इतना SHARE और LIKE करें कि देश मे हर व्यक्ति *बाबा साहब* के बारे मे जान सकें…………

*प्रश्न 1-* डॉ अम्बेडकर का जन्म कब हुआ था?

*उत्तर-* 14 अप्रैल 1891
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*प्रश्न 2-* डॉ अम्बेडकर का जन्म कहां हुआ था ?

*उत्तर-* मध्य प्रदेश इंदौर के महू छावनी में हुआ था।
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*प्रश्न 3-* डॉ अम्बेडकर के पिता का नाम क्या था?

*उत्तर-* रामजी मोलाजी सकपाल था।
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*प्रश्न 4-* डॉ अम्बेडकर की माता का नाम क्या था?
*उत्तर-* भीमा बाई ।
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*प्रश्न 5-* डॉ अम्बेडकर के पिता का क्या करते थे?

*उत्तर-* सेना मैं सूबेदार थे ।
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*प्रश्न 6-* डॉ अम्बेडकर की माता का देहांत कब हुआ था?

*उत्तर-* 1896
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*प्रश्न 7-* डॉ अम्बेडकर की माता के देहांत के वक्त उन कि आयु क्या थी ?

*उत्तर-* 5वर्ष।
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*प्रश्न 8-* डॉ अम्बेडकर किस जाती से थे?

*उत्तर-* महार जाती।
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*प्रश्न 9-* महार जाती को कैसा माना जाता था?

*उत्तर-* अछूत (निम्न वर्ग )।
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*प्रश्न10-* डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं कहां बिठाया जाता था?

*उत्तर-* क्लास के बहार।
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*प्रश्न 11-* डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं पानी कैसे पिलाया जाता था?

*उत्तर-* ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों परडालता था!
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*प्रश्न12-* बाबा साहब का विवाह कब और किस से हुआ?

*उत्तर-* 1906 में रमाबाई से।
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*प्रश्न 13-* बाबा साहब ने मैट्रिक परीक्षा कब पास की?

*उत्तर-* 1907 में।
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*प्रश्न 14-* डॉ अम्बेडकर के बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से क्या हुवा?

*उत्तर-* भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये।
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*प्रश्न 15-* गायकवाड़ के महाराज ने डॉ अंबेडकर को पढ़ने कहां भेजा?

*उत्तर-* कोलंबिया विश्व विद्यालय न्यूयॉर्क अमेरिका भेजा।
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*प्रश्न 16-* बैरिस्टर के अध्ययन के लिए बाबा साहब कहां और कब गए?

*उत्तर-* 11 नवंबर 1917 लंदन में।
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*प्रश्न 17-* बड़ौदा के महाराजा ने डॉ आंबेडकर को अपने यहां किस पद पर रखा?

*उत्तर-* सैन्य सचिव पद पर।
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*प्रश्न 18-* बाबा साहब ने सैन्य सचिव पद को क्यों छोड़ा?

*उत्तर-* छुआ छात के कारण।
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*प्रश्न 19-* बड़ौदा रियासत में बाबा साहब कहां ठहरे थे?

*उत्तर-* पारसी सराय में।
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*प्रश्न 20-* डॉ अंबेडकर ने क्या संकल्प लिया?

*उत्तर-* जब तक इस अछूत समाज की कठिनाइयों को समाप्त ने कर दूं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।
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*प्रश्न 21-* डॉ अंबेडकर ने कौनसी पत्रिका निकाली?

*उत्तर-* मूक नायक ।

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*प्रश्न 22-* बाबासाहेब वकील कब बने?

*उत्तर-* 1923 में ।
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*प्रश्न 23-* डॉ अंबेडकर ने वकालत कहां शुरु की?

*उत्तर-* मुंबई के हाई कोर्ट से ।
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*प्रश्न 24-* अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को क्या संदेश दिया?

*उत्तर-* शिक्षित बनो संघर्ष करो संगठित रहो ।
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*प्रश्न 25-* बाबा साहब ने बहिष्कृत भारत का
प्रकाशन कब आरंभकिया?

*उत्तर-* 3 अप्रैल 1927
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*प्रश्न 26-* बाबासाहेब लॉ कॉलेज के प्रोफ़ेसर कब बने?

*उत्तर-* 1928 में।
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*प्रश्न 27-* बाबासाहेब मुंबई में साइमन कमीशन के सदस्य कब बने?

*उत्तर-* 1928 में।
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*प्रश्न 28-* बाबा साहेब द्वारा विधानसभा में माहर वेतन बिल पेश कब हुआ?

*उत्तर-* 14 मार्च 1929
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*प्रश्न 29-* काला राम मंदिर मैं अछुतो के प्रवेश के लिए आंदोलन कब किया?

*उत्तर-* 03 मार्च 1930
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*प्रश्न 30-* पूना पैक्ट किस किस के बीच हुआ?

*उत्तर-* डॉ आंबेडकर और महात्मा गांधी।
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*प्रश्न 31-* महात्मा गांधी के जीवन की भीख मांगने बाबा साहब के पास कौनआया?

*उत्तर-* कस्तूरबा गांधी
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*प्रश्न 32-* डॉ अम्बेडकर को गोल मेज कॉन्फ्रंस का निमंत्रण कब मिला?

*उत्तर-* 6 अगस्त 1930
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*प्रश्न 33-* डॉ अम्बेडकर ने पूना समझौता कब किया?

*उत्तर-* 1932 ।
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*प्रश्न 34-* अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त कियागया?

*उत्तर-* 13 अक्टूबर 1935 को।
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*प्रश्न 35-* मुझे पढे लिखे लोगोँ ने धोखा दिया ये शब्द बाबा साहेब ने कहां कहे थे?

*उत्तर-* आगरा मे 18 मार्च 1956 ।
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*प्रश्न 36-* बाबा साहेब के पि. ए. कोन थे?

*उत्तर-* नानकचंद रत्तु।
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*प्रश्न 37-* बाबा साहेब ने अपने अनुयाइयों से क्या कहा था?

*उत्तर-* – इस करवा को मै बड़ी मुस्किल से यहाँ तक लाया हु !
इसे आगे नहीं ले जा सकते तो पीछे मत जाने देना।
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*प्रश्न 38-* देश के पहले कानून मंत्री कौन थे?

*उत्तर-* डॉ अम्बेडकर।
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*प्रश्न 39-* स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना किस ने की?

*उत्तर-* डॉ अम्बेडकर।
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*प्रश्न 40-* डॉ अंबेडकर ने भारतीय संविधान कितने समय में लिखा?

*उत्तर- 2* साल 11 महीने 18 दिन।
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*प्रश्न 41-* डा बी.आर. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्मं कब और कहा अपनाया?

*उत्तर -* 14 अक्टूबर 1956, दीक्षा भूमि, नागपुर।
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*प्रश्न 42-* डा बी.आर. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्मं कितने लोगों के साथ अपनाया?

*उत्तर-* लगभग 10 लाख।
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*प्रश्न 43-* राजा बनने के लिए रानी के पेट की जरूरत नहीं,
तुम्हारे वोट की जरूरत है ये शब्द किस के है?

*उत्तर-* डा बी.आर. अम्बेडकर।
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*प्रश्न 44-* डा बी.आर. अम्बेडकर के दुवारा लिखित महान पुस्तक का क्या नाम है?

*उत्तर-* दी बुद्ध एंड हिज धम्मा।
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*प्रश्न 45* – बाबा साहेब को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया?

*उत्तर-* भारत रत्न।
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★★★★★★★★★★★★★★

आज तक हमे बताया जाता है कि 22years का Cricket खेलने वाला,
10वीं मे फेल होने वाला सचिन Cricket का भगवान बना……..

Petrol पंप पर काम करने वाला, अबांनी करोडपती बना,

चाय बेचने वाला मोदी Prime minister. बना…….

लेकिन कभी किसी ने ये नही बताया कि…
*Class Room के बाहर बैठकर पढने वाला एक दलित बालक*
*”डा• भीम राव अम्बेडकर “* इस देश का शिल्पकार (संविधान निर्माता ) बना……….

और सबसे बढकर इस ससांर में
*”सिबंल आफॅ नालेज”’* बना…..

कुछ लोग तो इसे शेयर करने से भी बचेंगे कि कहीं उनकी छवि खराब न हो जाए।

आप में अगर हिम्मत है तो फिर

फारवर्ड टू ऑल।

*🙏🏻जय भीम जय भारतीय संविधान🙏🏻*
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Success Stories

#STORY#

मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर, 1935 को हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को भारत-पाक विभाजन के समय हुए दंगों में खो दिया था। वह भारत उस ट्रेन से आए थे जो पाकिस्तान का बॉर्डर पार करके शरणार्थियों को भारत लाई थी। अत: परिवार के नाम पर उनकी सहायता के लिए उनके बड़े भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह का नाम सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने कटक में हुए राष्ट्रीय खेलों में 200 तथा 400 मीटर में रिकॉर्ड तोड़ दिए। 1958 में ही उन्होंने टोकियो में हुए एशियाई खेलों में 200 तथा 400 मीटर में एशियाई रिकॉर्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीते। इसी वर्ष अर्थात 1958 में कार्डिफ (ब्रिटेन) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन्हीं सफलताओं के कारण 1958 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। मिल्खा सिंह का नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ने का भी एक कारण था। वह तब लाहौर में भारत-पाक प्रतियोगीता में दौड़ रहे थे। वह एशिया के प्रतिष्ठित धावक पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर में पछाड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गए, तब लोगों ने कहा- ”मिल्खा सिंह दौड़ नहीं रहे थे, उड़ रहे थे।” बस उनका नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ गया।

मिल्खा सिंह ने अनेक बार अपनी खेल योग्यता सिद्ध की। उन्होंने 1968 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्होंने ओलंपिक के पिछले 59 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दौड़ पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पंजाब में परी-कथा की भांति याद किया जाता है और यह पंजाब की समृद्ध विरासत का हिस्सा बन चुकी है। इस वक्त अनेक ओलंपिक खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ा था। उनके साथ विश्व के श्रेष्ठतम एथलीट हिस्सा ले रहे थे। 1960 में रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ की प्रथम हीट में द्वितीय स्थान (47.6 सेकंड) पाया था। फिर सेमी फाइनल में 45.90 सेकंड का समय निकालकर अमेरिकी खिलाड़ी को हराकर द्वितीय स्थान पाया था। फाइनल में वह सबसे आगे दौड़ रहे थे। उन्होंने देखा कि सभी खिलाड़ी काफी पीछे हैं अत: उन्होंने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी। परन्तु दूसरे खिलाड़ी गति बढ़ाते हुए उनसे आगे निकल गए। अब उन्होंने पूरा जोर लगाया, परन्तु उन खिलाड़ियों से आगे नहीं निकल सके। अमेरिकी खिलाड़ी ओटिस डेविस और कॉफमैन ने 44.8 सेकंड का समय निकाल कर प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दक्षिण अफ्रीका के मैल स्पेन्स ने 45.4 सेकंड में दौड़ पूरी कर तृतीय स्थान प्राप्त किया। मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंड का समय निकाल कर मात्र 0.1 सेकंड से कांस्य पदक पाने का मौका खो दिया।

मिल्खा सिंह को बाद में अहसास हुआ कि गति को शुरू में कम करना घातक सिद्ध हुआ। विश्व के महान एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा में वह पदक पाने से चूक गए। मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी। आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है। रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे। यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था। उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे। लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे। अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है। उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे। मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी।

मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं। प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा। दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए। इसी प्रथम घटना के कारण जब मिल्खा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मिल्खा तो वह विशेष उत्साहित नहीं हुए। लेकिन उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मनाया गया। उस वक्त पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खादिक था जो अनेक एशियाई प्रतियोगिताओं में 200 मीटर की दौड़ जीत चुका था। ज्यों ही 200 मीटर की दौड़ शुरू हुई यूं लगा कि मानो मिल्खा सिंह दौड़ नहीं, उड़ रहें हों। उन्होंने अब्दुल खादिक को बहुत पीछे छोड़ दिया। लोग उनकी दौड़ को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। तभी यह घोषणा की गई कि मिल्खा सिंह दौड़ने के स्थान पर उड़ रहे थे और मिल्खा सिंह को ‘फ़्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उस दौड़ के वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब भी मौजूद थे। इस दौड़ में जीत के पश्चात् मिल्खा सिंह को राष्ट्रपति से मिलने के लिए वि.आई.पी. गैलरी में ले जाया गया। मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई ट्राफियां, पदक, उनके जूते (जिन्हें पहन कर उन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ा था), ब्लेजर यूनीफार्म उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय को दान में दे दिए थे। 1962 में एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। खेलों से रिटायरमेंट के पश्चात् वह इस समय पंजाब में खेल, युवा तथा शिक्षा विभाग में अतिरिक्त खेल निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

उनका विवाह पूर्व अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी निर्मल से हुआ था। मिल्खा सिंह के एक पुत्र तथा तीन पुत्रियां है। उनका पुत्र चिरंजीव मिल्खा सिंह (जीव मिल्खा सिंह भी कहा जाता है) भारत के टॉप गोल्फ खिलाड़ियों में से एक है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कार जीत चुका है। उसने 1990 में बीजिंग के एशियाई खेलों में भी भाग लिया था। मिल्खा सिंह की तीव्र इच्छा है कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक पदक जीते, जो पदक वह अपनी छोटी-सी गलती के कारण जीतने से चूक गए थे। मिल्खा सिंह चाहते हैं कि वह अपने पद से रिटायर होने के पश्चात् एक एथलेटिक अकादमी चंडीगढ़ या आसपास खोलें ताकि वह देश के लिए श्रेष्ठ एथलीट तैयार कर सकें। मिल्खा सिंह अपनी लौह इच्छा शक्ति के दम पर ही उस स्थान पर पहुँच सके, जहाँ आज कोई भी खिलाड़ी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के नहीं पहुँच सका।

उपलब्धियां
1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47.5 सेकंड का नया रिकॉर्ड बनाया।
टोकियो जापान में हुए तीसरे एशियाड (1958) में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर तथा 200 मीटर में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए।
जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुए चौथे एशियाड (1959) में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।
1959 में भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।
1960 में रोम ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ा।
1962 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।

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#STORY#

राजीव राधेश्याम दीक्षित भारत के महान व्यक्तित्व थे। वह एक भारतीय समाजिक कार्यकर्त्ता थे। वो गरीब और जरूरतमंद भारतियों के समर्थक थे। बहुत सालों से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे थे। वह भारतीय स्वतंत्रता के समर्थक थे और भारत में स्वाभिमान आन्दोलन, आजादी आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन के माध्यम से देश में जागरूकता फ़ैलाने के लिए प्रयासरत थे। वह भारतीयता के एक मजबूत आस्तिक और उपदेशक थे।

राजीव दीक्षित का जन्म और जीवन
राजीव दीक्षित का जन्म भारत के उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के नाह गाँव में 30 नवम्बर 1967 को हुआ था। वह स्वतंत्रता सेनानीयों के परिवार से थे। वह एक भारतीय वैज्ञानिक थे, उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया है। साथ ही वे फ्रांस के दूर संचार क्षेत्र में भी वैज्ञानिक के तौर पर काम कर चुके थे। उन्होंने भारतीय इतिहास के बारे में, भारतीय संविधान के मुद्दों और भारतीय आर्थिक नीति के बारे में भी जागरूकता फ़ैलाने के लिए प्रयास किया।

राजीव दीक्षित का पारिवारिक जीवन
उनके पिता का नाम राधेश्याम दीक्षित था। वे मानवीय सभ्यता का दुनिया भर में प्रसार करते थे। वे ब्रह्मचारी थे उन्होंने कभी शादी नहीं की। 1997 में जब उनकी पहली मुलाकात प्रोफ़ेसर धर्मपाल से हुई तो वो उनसे काफ़ी प्रभावित हुए। वो 1999 से बाबा रामदेव के साथ सहयोग करते रहे थे। वो चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों से प्रेरित थे। बाद में वो महात्मा गाँधी के शुरुआती कार्यों के सराहना करते हुए और शराब, गुटखा इत्यादि के उत्पादन के विरुद्ध में कार्य करते हुए गौ रक्षा और सामाजिक अन्यायों के विरुद्ध लडाई लड़ते अपने जीवन को समर्पित कर दिए।

राजीव दीक्षित की शिक्षा
अपने पिता के देख रेख में उन्होंने फिरोजाबाद जिले के गाँव में स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद पी।डी। जैन इंटर कॉलेज से उन्होंने 12वीं कक्षा तक की पढाई की। उन्होंने अपनी स्नातक की पढाई की शुरुआत 1984 में के। के। एम। कॉलेज, जमुई बिहार से इलेक्ट्रॉनिक और संचार में बी। टेक की डिग्री लेकर पूरी की। उन्होंने एम टेक की डिग्री भी आई आई टी खड़गपुर से प्राप्त की थी, लेकिन मातृभूमि की सेवा का जूनून हमेशा ही उन्हें अपनी ओर खीचता रहा, इसलिए वो सामाजिक सेवा के कार्य में अपने योगदान दिए।

राजीव दीक्षित का करियर
भारत में लगभग 8000 बहुराष्ट्रीय कंपनिया है, जो भारत में अपना प्रसार कर रही है। उस कंपनी के उत्पादों के लिए भारतीय कड़ी मेहनत करते है, लेकिन सभी उत्पाद उनके देश में भेज दिए जाते है इसलिए उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन शुरू किया और हर भारतीय से आग्रह किये कि वो स्वदेशी उत्पादों को अपनाये। उन्होंने कोका कोला, पेप्सी, यूनिलीवर और कोलगेट जैसी कम्पनी के खिलाफ़ लडाई लड़ी और शीतल पेय पदार्थों में जहर होने की बात कही। इसके लिए उन्होंने लम्बी लडाई भी लड़ी और ये साबित भी कर दिया कि इन पेय पदार्थों में जहर है। इन्हें पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उनका ऐसा मानना था कि इन कंपनियों ने अपने देश में धन को कम कर दिया है, जिससे भारत और गरीब होता जा रहा है। दीक्षित ने सुझाव दिया था कि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को स्विस बैकों में जमा भारतीय काली सम्पति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर देनी चाहिए। भारत में स्विस बैंक में जमा पूंजी को लाने के लिए अपनी मुहीम में उन्होंने 495 लाख लोगों के हस्ताक्षर को भी इकठ्ठा किया था। 9 जनवरी 2009 को वह भारत के स्वाभिमान ट्रस्ट के सचिव बन गए थे। स्वदेशी में उनका विश्वास था। नई दिल्ली में उन्होंने एक स्वदेशी जागरण मंच का नेतृत्व किया जिसमे 50,000 से भी अधिक लोगों को उन्होंने संबोधित किया। इसके अलावा उन्होंने कलकत्ता में भी विभिन्न संगठनो और प्रमुख व्यक्तियों द्वारा समर्थित आयोजित कार्यक्रम का नेतृत्व किया। उन्होंने जनरल स्टोर की एक ऐसी श्रृंखला को खोलने के लिए आन्दोलन किया जहा सिर्फ़ भारतियों द्वारा बनाये गए उत्पाद की बिक्री हो। वह आजादी बचाओं आन्दोलन के प्रवक्ता थे। उन्होंने कराधान प्रणाली के विकेंद्रीकरण की मांग करते हुए कहा था कि वर्तमान प्रणाली में जो नौकरशाही है, वह भ्रष्टाचार के मुख्य कारण थे, साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया था कि राजस्व कर का 80% तक राजनेताओं और नौकरशाहों के भुगतान के लिए इस्तेमाल किया गया था। आम जनता के विकास उदेश्यों के लिए सिर्फ़ 20% का ही उपयोग किया जाता है। उन्होंने सरकार के मौजूदा बजट प्रणाली की तुलना भारत के पहले ब्रिटिश बजट प्रणाली से करते हुए यह दर्शाया था कि जो भी आंकड़े बजट में पेश किये जाते है वो उस वक्त की बजट प्रणाली के समान ही थे। उन्होंने अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले को लेकर सवाल भी उठाया था और आतंकी हमले पर संदेह किया था। उन्होंने दावा किया था कि यह अमेरिका के सरकार द्वारा ही कराया गया था उन्होंने यू। एस। के लोन लालटेन सोसाइटी के दावों का समर्थन किया था। राजीव दीक्षित ने ये कहा था कि वर्तमन में हमारे पास तीन बुराइयां आ रही है। यह उन्होंने वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण को एक आत्मघाती राज्य की ओर धकेलने वाली बुराई के रूप में बताया था। 1998 में उपनिवेशवाद के हिंसक इतिहास पर एक प्रदर्शनी पेश करते हुए कहा था यह आधुनिक भारत के लिए भयावह है। इसके साथ ही उन्होंने यह तर्क दिया था और कहा था कि आधुनिक विचारकों ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है, जिस वजह से किसान स्वयं मानसिक दबाव में आकर आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे है और उन्हें ऐसा करने के लिए छोड़ दिया गया है। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका और क़ानूनी व्यवस्था के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत अब भी ब्रिटिश युग के दौरान लागु किये गए कानूनों का पालन कर रहा है और भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें बदलने की कोशिश भी नहीं कर रहा है। राजीव दीक्षित ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार पर यू एस ए के एजेंट होने का आरोप लगाया। उन्होंने यह दावा किया कि रेडियों सक्रिय तत्वों का एक बड़ा भंडार भारतीय समुन्द्र के सेतु पुल के नीचे मौजूद है, जिसकी इतनी विशाल मात्रा है कि 150 वर्षों तक इन रेडियों सक्रिय तत्वों का इस्तेमाल बिजली और परमाणु हथियार बनाने के लिए किया जा सकता है। और उन्होंने यह भी कहा की भारत सरकार उस पुल को तोड़ने की कोशिश कर रही है जो 7,00,000 साल पुराना है।

राजीव दीक्षित की उपलब्धियां
•सभी समय के नागरिक अधिकार नेता और सबसे लोकप्रिय नेता के रूप 28 वें स्थान तथा सबसे मशहुर व्यक्ति के रूप में 5877 वें स्थान पर उनका नाम आता है।
•राजीव दीक्षित ने कई पुस्तकें लिखी और कई लेक्चर भी दिए जिनका संग्रह सीडी, एसडी कार्ड्स इत्यादि जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में संग्रहित है, जिन्हें विभिन्न ट्रस्टों के द्वारा प्रकाशित कराया गया है।
•ऑडियो रूप में उनकी 1999 में भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय अतीत की महनता पर ऑडियो कैसेट बनी थी इसके अलावा ऑडियो में उनकी स्वास्थ्य कथा भी है।
•पुस्तकों में उनके द्वारा रचित है- स्वदेशी चिकित्सा, गौ गौवंश पर आधारित स्वदेशी कृषि, गौ माता, पंचगव्य चिकित्सा। ये सभी उनकी उपलब्धियों में शामिल है।

राजीव दीक्षित की मृत्यु और विवाद
राजीव दीक्षित का निधन 30 नवम्बर 2010 को छत्तीसगढ़ के भिलाई में दिल का दौरा पड़ने की वजह से हो गया था। उनकी याद में हरिद्वार में भारत स्वाभिमान बिल्डिंग का निर्माण हुआ है जिसका नाम राजीव भवन रखा गया है। उनकी मृत्यु हुए कई वर्ष बीत चुके है लेकिन अभी भी उनकी मृत्यु के कारणों पर अनिश्चिता बनी हुई है और उनकी मौत का कारण अज्ञात है।

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#STORY#

बिल गेट्स को किसी परिचय कि आवश्यकता नहीं है, वह पूरी दुनिया में अपने कार्यों से जाने जाते हैं। हम सभी यह भली भांति जानते हैं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ Software Company “Microsoft” की नींव भी बिल गेट्स के द्वारा ही रखी गयी है।

बिल गेट्स का परिवार
बिल गेट्स का वास्तविक तथा पूर्ण नाम विलियम हेनरी गेट्स है। इनका जन्म 28 अक्टूबर, 1955 को वाशिंगटन के सिएटल में हुआ। इनके परिवार में इनके अतिरिक्त चार और सदस्य थे – इनके पिता विलियम एच गेट्स जो कि एक मशहूर वकील थे, इनकी माता मैरी मैक्‍सवेल गेट्स जो प्रथम इंटरस्टेट बैंक सिस्टम और यूनाइटेड वे के निदेशक मंडल कि सदस्य थी तथा इनकी दो बहनें जिनका नाम क्रिस्टी और लिब्बी हैं। बिल गेट्स ने अपने बचपन का भी भरपूर आनंद लिया तथा पढ़ाई के साथ वह खेल कूद में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।

बिल गेट्स का बचपन
उनके माता – पिता उनके लिए क़ानून में करियर बनाने का स्वप्न लेकर बैठे थे परन्तु उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर विज्ञान तथा उसकी प्रोग्रामिंग भाषाओं में रूचि थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लेकसाइड स्कूल में हुई। जब वह आठवीं कक्षा के छात्र थे तब उनके विद्यालय ने ऐएसआर – 33 दूरटंकण टर्मिनल तथा जनरल इलेक्ट्रिक (जी।ई।) कंप्यूटर पर एक कंप्यूटर प्रोग्राम खरीदा जिसमें गेट्स ने रूचि दिखाई। तत्पश्चात मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा जिसका नाम “टिक-टैक-टो” (tic-tac-toe) तथा इसका प्रयोग कंप्यूटर से खेल खेलने हेतु किया जाता था। बिल गेट्स इस मशीन से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा जानने को उत्सुक थे कि यह सॉफ्टवेयर कोड्स किस प्रकार कार्य करते हैं।

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के प्रति बिल गेट्स की लगन
इसके पश्चात गेट्स डीईसी (DEC), पीडीपी (PDP), मिनी कंप्यूटर नामक सिस्टमों में दिलचस्पी दिखाते रहे, परन्तु उन्हें कंप्यूटर सेंटर कॉरपोरेशन द्वारा ऑपरेटिंग सिस्टम में हो रही खामियों के लिए 1 महीने तक प्रतिबंधित कर दिया गया। इसी समय के दौरान उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर सीसीसी के सॉफ्टवेयर में हो रही कमियों को दूर कर लोगों को प्रभावित किया तथा उसके पश्चात वह सीसीसी के कार्यालय में निरंतर जाकर विभिन्न प्रोग्रामों के लिए सोर्स कोड का अध्ययन करते रहे और यह सिलसिला 1970 तक चलता रहा। इसके पश्चात इन्फोर्मेशन साइंसेस आइएनसी। लेकसाइड के चार छात्रों को जिनमें बिल गेट्स भी शामिल थे, कंप्यूटर समय एवं रॉयल्टी उपलब्ध कराकर कोबोल (COBOL), पर एक पेरोल प्रोग्राम लिखने के लिए किराए पर रख लिया।

इसके पश्चात उन्हें रोकना नामुमकिन था। मात्र 17 वर्ष कि उम्र में उन्होंने अपने मित्र एलन के साथ मिलकर ट्राफ़- ओ- डाटा नामक एक उपक्रम बनाया जो इंटेल 8008 प्रोसेसर (Intel 8008 Processor) पर आधारित यातायात काउनटर (Traffic Counter) बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया। 1973 में वह लेकसाइड स्कूल से पास हुए तथा उसके पश्चात बहु- प्रचलित हारवर्ड कॉलेज में उनका दाखिला हुआ। परन्तु उन्होंने 1975 में ही बिना स्नातक किए वहाँ से विदा ले ली जिसका कारण था उस समय उनके जीवन में दिशा का अभाव। उसके पश्चात उन्होंने Intel 8080 चिप बनाया तथा यह उस समय का व्यक्तिगत कंप्यूटर के अन्दर चलने वाला सबसे वहनयोग्य चिप था, जिसके पश्चात बिल गेट्स को यह एहसास हुआ कि समय द्वारा दिया गया यह सबसे उत्तम अवसर है जब उन्हें अपनी स्वयं कि कंपनी का आरम्भ करना चाहिए।

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का उत्थान
MITS (Micro Instrumentation and Telemetry Systems) जिन्होंने एक माइक्रो कंप्यूटर का निर्माण किया था, उन्होंने गेट्स को एक प्रदर्शनी में उपस्थित होने कि सहमती दी तथा गेट्स ने उनके लिए अलटेयर एमुलेटर (Emulator) निर्मित किया जो Mini Computer और बाद में इंटरप्रेटर में सक्रिय रूप से कार्य करने लगा। इसके बाद बिल गेट्स व् उनके साथी को MITS के अल्बुकर्क स्थित कार्यालय में काम करने कि अनुमति दी गयी। उन्होंने अपनी जोड़ी का नाम Micro-Soft रखा तथा अपने पहले कार्यालय कि स्थापना अल्बुकर्क में ही की। 26 नवम्बर, 1976 को उन्होंने Microsoft का नाम एक व्यापारिक कंपनी के तौर पर पंजीकृत किया। Microsoft Basic कंप्यूटर के चाहने वालों में सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया था। 1976 में ही Microsoft MITS से पूर्णत: स्वतंत्र हो गया तथा Gates और Allen ने मिलकर कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग भाषा Software का कार्य जारी रखा। इनसे बाद Microsoft ने अल्बुकर्क में अपना कार्यालय बंद कर बेलेवुए, वाशिंगटन में अपना नया कार्यालय खोला। Microsoft ने उन्नति की ओर बढ़ते हुए प्रारंभिक वर्षों में बहुत मेहनत व् लगन से कार्य किया। गेट्स भी व्यावसायिक विवरण पर भी ध्यान देते थे, कोड लिखने का कार्य भी करते थे तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा लिखे गए व् जारी किये गए कोड कि प्रत्येक पंक्ति कि समीक्षा भी वह स्वयं ही करते थे। इसके बाद जानी मानी कंपनी IBM ने Microsoft के साथ काम करने में रूचि दिखाई, उन्होंने Microsoft से अपने पर्सनल कंप्यूटर के लिए बेसिक इंटरप्रेटर बनाने का अनुरोध किया। कई कठिनाइयों से निकलने के बाद गेट्स ने Seattle कंप्यूटर प्रोडक्ट्स के साथ एक समझौता किया जिसके बाद एकीकृत लाइसेंसिंग एजेंट और बाद में 86-DOS के वह पूर्ण आधिकारिक बन गए और बाद में उन्होंने इसे आईबीएम को $80,000 के शुल्क पर PC-DOS के नाम से उपलब्ध कराया। इसके पश्चात Microsoft का उद्योग जगत में बहुत नाम हुआ। 1981 में Microsoft को पुनर्गठित कर बिल गेट्स को इसका चेयरमैन व् निदेशक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया। जिसके बाद Microsoft ने अपना Microsoft Windows का पहला संस्करण पेश किया। 1975 से लेकर 2006 तक उन्होंने Microsoft के पद पर बहुत ही अदभुत कार्य किया, उन्होंने इस दौरान Microsoft कंपनी के हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।

बिल गेट्स का विवाह व् आगे का जीवन
1994 में बिल गेट्स का विवाह फ्रांस में रहने वाली Melinda से हुआ तथा 1996 में इन्होंने जेनिफर कैथेराइन गेट्स को जन्म दिया। इसके बाद मेलिंडा तथा बिल गेट्स के दो और बच्चे हुए जिनके नाम रोरी जॉन गेट्स तथा फोएबे अदेले गेट्स हैं। वर्तमान में बिल गेट्स अपने परिवार के साथ वाशिंगटन स्थित मेडिना में उपस्थित अपने सुन्दर घर में रहते हैं, जिसकी कीमत 1250 लाख डॉलर है।

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का उदय
वर्ष 2000 में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशनकी नींव रखी जो कि पारदर्शिता से संचालित होने वाला विश्व का सबसे बड़ा Charitable फाउंडेशन था। उनका यह फाउंडेशन ऐसी समस्याओं के लिए कोष दान में देता था जो सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ कर दी जाती थीं जैसे कि कृषि, कम प्रतिनिधित्व वाले अल्पसंख्यक समुदायों के लिये कॉलेज छात्रवृत्तियां, एड्स जैसी बीमारियों के निवारण हेतु, इत्यादि।

परोपकारी कार्य
सन 2000 में इस फाउंडेशन ने Cambridge University को 210 मिलियन डॉलर गेट्स कैम्ब्रिज छात्रवृत्तियों हेतु दान किये। वर्ष 2000 तक बिल गेट्स ने 29 बिलियन डॉलर केवल परोपकारी कार्यों हेतु दान में दे दिए। लोगों की उनसे बढती हुई उम्मीदों को देखते हुए वर्ष 2006 में उन्होंने यह घोषणा की कि वह अब Microsoft में अंशकालिक रूप से कार्य करेंगे और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन में पूर्णकालिक रूप से कार्य करेंगे। वर्ष 2008 में गेट्स ने Microsoft के दैनिक परिचालन प्रबंधन कार्य से पूर्णतया विदा ले ली परन्तु अध्यक्ष और सलाहकार के रूप में वह Microsoft में विद्यमान रहे।

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Success Stories

#STORY#

दुनिया की सबसे बड़े सर्च गूगल ने 2005 में आधिकारिक तौर पर अपना जन्मदिन 27 सितंबर को मनाने की घोषणा की थी। इसके पहले गूगल ने अपने बर्थडे की तारीख कई बार बदली है। 4 सितंबर, 1998 को बनी इस कंपनी ने सितंबर महीने के कई दिनों को अपने बर्थडे के तौर पर चुना था। 4, फिर 7, और 15, व 26 सितंबर के बाद आखिरकार 2005 में गूगल ने 27 सितंबर को अपना जन्मदिन तय कर लिया। 2005 के बाद से हर 27 सितंबर को गूगल अपने होम पेज पर आकर्षक डूडल बनाता आया है। ‘ब्रांड गूगल’ की चमत्कारिक सफलता की कहानी कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दो छात्रों के बीच दोस्ती के साथ शुरू हुई। शुरुआत में इन दोस्तों ने गूगल कंपनी एक कार गैराज से शुरू की थी, जो आज बहुत ही अधिक लोकप्रिय बन चुकी है। इंटरनेट सर्च मशीन से शुरू कर गूगल अब ई-मेल, फोटो और वीडियो, भूसर्वेक्षण नक्शों और मोबाइल फोन जैसी सेवाएं देने वाली ऑलराउंडर कंपनी बन गई है। सभी सेवाएं मुफ्त हैं। कमाई होती है व्यावसायिक कंपनियों से मिलने वाले विज्ञापनों से। गूगल की शुरुआत गैराज में बनाए गए ऑफिस से हुई थी। आज गूगल के हेडक्वार्टर ‘गूगलप्लेक्स’ समेत गूगल के 40 देशों में 70 से ज्यादा ऑफिस हैं।

दो मालिक हे आपस में नहीं पटती थी दोनों की
सर्जि ब्रिन और लैरी पेज 22-23 साल के थे, जब 1995 में वे पहली बार मिले। उस समय दोनों के बीच बिल्कुल नहीं पटती थी। हर बात पर बहस हो जाया करती थी। दोनों के माता-पिता बेहद पढ़े-लिखे टैक्नोक्रेट्स थे।

मिलकर बनाई सर्च मशीन
लैरी और सर्जि को दोस्त बनाया एक समस्या ने। वह थी इंटरनेट जैसे सूचनाओं के महासागर में से किसी खा़स सूचना को कैसे ढूंढ़ा जाए? दोनों ने मिल कर एक सर्च-मशीन बनाई, एक ऐसा कम्प्यूटर, जो कुछ निश्चित सिद्धांतों और नियमों के अनुसार किसी सूचना भंडार में से ठीक वही जानकारी ढूंढकर निकाले, जो हम चाहते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही किए परीक्षण- बुनियादी सिद्धांत ये था कि हाइपर लिंकिंग की मदद से किसी वेबसाइट को सर्च किए टर्म के हिसाब से इंटरनेट से खोजकर एक समझने योग्य सूची बनानी है। यूजर जिस भी शब्द, प्रश्न या आर्टिकल को सर्च करे, कम्प्यूटर उसके बारे में जितनी हो सके, संबंधित जानकारी यूजर्स के सामने पेश कर दे। ये एक ऐसी गुत्थी थी जिसे लैरी पेज और सर्जि ब्रिन ने मिलकर सुलझाया। दोनों ही प्रोफेशनल दोस्तों ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही आरंभिक परीक्षण किए। इसके लिए 11 लाख डॉलर धन जुटाया। लैरी पेज ने सबसे पहले वर्ल्ड वाइड वेब की मैथेमैटिकल प्रॉपर्टीज को समझने की कोशिश की। लैरी पेज ने इंटरनेट का हाइपरलिंक स्ट्रक्चर एक ग्राफ की मदद से समझा। इसके बाद लैरी पेज ने सर्जि ब्रिन के साथ एक रिसर्च प्रोजेक्ट ‘BackRub’ के साथ जुड़कर काम करना शुरू किया। दोनों दोस्तों ने एक साथ कई प्रोजेक्ट किए और अंत में 4 सितंबर, 1998 में इन दोनों ने मिलकर कंपनी की नींव रखी।

कार-गैरेज में बनी गूगल इनकॉपरेटेड
दोनों ने 7 सितंबर 1998 को, गूगल इनकॉपरेटेड के नाम से मेनलो पार्क, कैलिफोर्निया के एक कार गैरेज में अपनी कंपनी बनाई और काम शुरू कर दिया। दो ही वर्षों में गूगल का नाम सबकी जुबान पर था। जर्मनी में कम्प्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर डिर्क लेवान्दोस्की का मत है कि याहू जैसे अपने अन्य प्रतियोगियों की तुलना में गूगल शायद ही बेहतर है, लेकिन उसकी सार्वजनिक छवि कहीं अच्छी बन गई है।

सितंबर 2007 में गूगल ने पूरा किया अपना पहला दशक
यही उसकी चमत्कारिक सफलता का रहस्य है। इंटरनेट को दुनिया में आए दो दशक से ज्यादा समय हो गए हैं, जबकि गूगल ने सितंबर 2007 को अपना पहला दशक पूरा किया, तब भी दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं।

इस्तेमाल बढ़ने के साथ-साथ बढ़ते चले गए शेयर के दाम
इंटरनेट का इस्तेमाल जितना बढ़ रहा है, गूगल के शेयर भी उतने ही चढ़ रहे हैं। अगस्त 2004 में गूगल ने जब पहली बार शेयर बाज़ार में पैर रखा, तब उसके शेयर 85 डॉलर में बिक रहे थे। तीन वर्ष बाद, नवंबर 2007 में इसके शेयर उछलकर 747 डॉलर पर पहुंच गए थे।

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